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Thursday, September 1, 2011


ન  રૂપરમણી  ન  કોમળ   કળાભરી  કામિની
નહીં   સુરભિવંત   રંગરસિયેણ   તું   પદ્મિની
છટા નહિ ન શોખ ના થનગનાટ ના અબ્ધિની
ગંભીર  ભરતીહુલાસ  તુજમાં   નહીં  ભામિની
પણ તું મનુજ છે  વિશેષ  મુજ  ઈશદીધી વહુ
દીધું ગૃહ પથારી અર્ધ  ઉર દેઈ  કાં ન ચહું 

देश भर में गणेश चतुर्थी की धूम

देश भर में गणेश चतुर्थी की धूम

Tuesday, August 30, 2011

Gmail - Inbox (38) - harshad.brahmbhatt@gmail.com

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Harshad Brahmbhatt (86)

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अन्ना जी क्रांति की सौदेबाजी में हारी तो जनता है

अन्ना जी क्रांति की सौदेबाजी में हारी तो जनता है

મહોબ્બતમાં હવે મારો પરિચય આ પ્રમાણે છે,
અજાણ્યાં થઈ ગયાં છે એ મને જે ખાસ જાણે છે.

દીધો’ તો સાથ જેણે, એ જ ખુદ લૂંટી ગયા અમને,
જરા સાવધ-વધુ, જોખમ અહીં તો ઓળખાણે છે.

મળ્યો છે નાખુદા એના પછી થઈ છે દશા આવી,
હતાં તોફાન જે દરિયે, હવે મારાં વહાણે છે.

સુણું છું મારી વાતો તો મને એ થાય છે અચરજ,
કે મારાથી વધારે શું મને લોકો પિછાણે છે ?

કરી દે તીક્ષ્ણ એવી, મોતનું પણ માથું કાપી લે,
હવે આ જિંદગી મારી સમય ! તારી સરાણે છે.

જીવનના ભેદભાવો છે મરણની બાદ પણ બાકી,
કોઈ માનવ મઝારે છે, કોઈ માનવ મસાણે છે.

હતા જે દેહ એ તો થઈ ગયા માટી મહીં માટી,
હતાં જે દિલ, હજી પણ તાજના આરસ પહાણે છે.

જગત ખેંચી રહ્યું છે એક તરફ, બીજી તરફ જન્નત,
ફસ્યો છે જીવ કે એને અહીં તો બેય તાણે છે.

કદર “બેફામ” શું માંગુ જીવનની એ જગત પાસે,
કે જ્યાંનાં લોકો સૌ કેવળ મરેલાને વખાણે છે

ગીત ગુંજ: નરસિંહ મહેતાના ભજન

ગીત ગુંજ: નરસિંહ મહેતાના ભજન

આશાઓ પર પાણી ફરી જતાં વાર નથી લાગતી
કિનારે આવી ડૂબી જતાં વાર નથી લાગતી

જીતનો જલસો માનવાની ઉતાવળ ન કર
જીતેલી બાજી હારી જવામાં વાર નથી લાગતી

તારી ઊંચાઇનું નાહક અભિમાન ન કર
કે મિનારોને તૂટી જવામાં વાર નથી લાગતી

બાંધ્યો છે માળો તો જરા દિલથી જતન કર
કે માળાને પીંખાઇ જતાં વાર નથી લાગતી

માણી લે હર એક પળ તું આજે
આંખોને મિંચાઇ જતાં વાર નથી લાગતી

મૃગજળમાં જાળ નાખ્યા કરવાથી,
માછલાં ન મળે…
આંસુ વાવવાથી,
મોતી ન ઊગે…
અને
ઝાકળ ભેગી કર્યે,
ઘડા ન ભરાય…

…આવાં અનેક સત્યો સંબંધની
શરૂઆતમાં સમજાતાં હોત તો ?

કાજલ ઓઝા- વૈદ્ય

હોઇશ જો હું ફૂલ તો કરમાઇ જાવાનો
દીવો જો હું હોઇશ તો બુઝાઇ જાવાનો
સ્મૃતિ રૂપેય રહીશ તો સિક્કાની જેમ હું
અહીંયાથી ત્યાં પહોંચતા ખરચાઇ જાવા

Monday, August 29, 2011

दशहरा-दिवाली के समय और महंगा हो सकता है दूध :: Pressnote.in

दशहरा-दिवाली के समय और महंगा हो सकता है दूध :: Pressnote.in

अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) :: Pressnote.in

अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) :: Pressnote.in

अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) जन्म नाम: इन्किलाब श्रीवास्तव जन्म तिथि: 11 अक्टूबर, 1942 जन्म स्थान: इलाहबाद, उत्तर प्रदेश कद: 62" परिवार: पत्नी: जया बच्चन, बेटा: अभिषेक बच्चन ,बहु: ऐश्वर्या राय बच्चन , बेटी:श्वेता नंदा पहली फिल्म: सात हिन्दुस्तानी पहली सफल फिल्म: जंजीर उपनाम: बिग बी,एंग्री यंग मेन,शहेंशाह धारावाहिक:कौन बनेगा करोड़पति फिल्म कंपनी:ए.बी.सी.एल बिग बी के नाम से जाने जाने वाले अमिताभ बॉलीवुड के शहेंशाह भी कहे जाते है| 40 साल बाद भी आज बॉलीवुड में उनके कद के सामने कोई नहीं है और 67 की उम्र में भी आज वे बॉलीवुड के सबसे व्यस्त अभिनेताओं में गिने जाते है| शुरू में जिस बाहरी आवाज़ के कारण निर्देशकों ने अमिताभ को अपनी फिल्मों से लेने को मना कर दिया था, वही आवाज़ आगे चलकर उनकी विशिष्टता बनी| 40 साल के पेशे में उन्हें दर्शकों ने अनेको नाम दिए: बिग बी , शहेंशाह, एंग्री यंग मेन आदि| अमिताभ ने न सिर्फ बड़े परदे पर खुद को साबित किया पर छोटे परदे पर भी नए आयाम स्थापित किये| धारावाहिक कौन बनेगा करोडपति से उन्होंने अपनी जिंदगी की नयी पारी की शुरुआत की थी और एक के बाद एक नया उच्चमान हासिल करते गए| एक अभिनेता के आलावा, अभिताभ एक गायक, निर्माता और सांसद की भूमिका भी निभा चुके है| पेशा(करियर) अमिताभ ने अपनी फ़िल्मी करियर की शुरुआत सं 1969 में सात हिन्दुस्तानी से की| कहा जाता है कि उन्हें इस फिल्म में काम अपने दोस्त राजीव गाँधी की बदौलत मिला जिन्होंने अमिताभ को इंदिरा गाँधी का सिफारशी ख़त दिलवाया(सूत्र:आईऍमडीबी)| इससे पहले उन्हें अपनी भारी आवाज़ और सांवले रंग की वजह से नजर अंदाज़ कर दिया गया था| उनकी भारी आवाज़ कथा विवरण के लिय इस्तेमाल होती थी और वे रेडियो पर भी आते थे| हालांकि फिल्म कुछ ख़ास कमाल नहीं कर पायी पर अमिताभ को राष्ट्रीय पुरस्कार (नवांगतुक अभिनेता) से सम्मानित किया गया| 1971 में उन्होंने उस वक़्त के सितारे राजेश खन्ना के साथ आनंद में जोड़ी बनायीं| हालांकि फिल्म में राजेश खन्ना के होने कि वजह से अमिताभ का किरदार दबा हुआ रहा पर उन्हें फिल्मफेयर सह कलाकार का पुरस्कार जरुर मिला| उन्होंने आगे परवाना, रेशमा और शेरा और बॉम्बे टू गोवा जैसी फिल्में कि जो औसतन रही| 17 फिल्में करने के बाद भी अमिताभ एक बड़ी सफलता के इंतज़ार में थे जब 1973 में प्रकाश महरा ने उन्हें जंजीर में न्योता दिया| अमिताभ को यह किरदार प्राण के कहने पर मिला और उन्होंने इस अवसर को दोनों हाथ से उठा लिया| न सिर्फ ये उनके पेशे कि पहली बड़ी सफल फिल्म थी, इस फिल्म से उन्हें एंग्री यंग मेन का ख़िताब भी मिला| उसी साल उनकी जया भादुरी से शादी हुई और एक महीने बाद उनकी अगली फिल्म अभिमान दर्शकों के सामने आई| उनकी अगली फिल्म दोस्ती पर हृषिकेश की नमक हराम आई| 1975 में उन्होंने कई तरह की फिल्मों में काम किया जिनमे चुपके चुपके बेहद लोकप्रिय रही| 1975 में उन्होंने यश चोपरा की फिल्म दीवार में काम किया और ये अब तक की उनकी सबसे सफल फिल्म रही| इस फिल्म के संवाद, जैसे "मेरा बाप चोर है", "मेरे पास माँ है", आज भी दर्शकों के जहन में बैठे है| उनकी अगली फिल्म आई "शोले" जिसने बॉलीवुड के सारे उच्चमान तोड़ दिए और अमिताभ को बॉलीवुड के शीर्ष अभिनेताओं में ला खड़ा किया| बच्चन ने फिल्म जगत के कुछ शीर्ष के कलाकारों जैसे धर्मेन्‍द्र, हेमा मालिनी, संजीव कुमार, जया बच्चन और अमजद खान के साथ जयदेव की भूमिका अदा की थी। 1999 में बीबीसी ने शोले को इस शताब्दी की सबसे बेहतरीन फिल्म बताया और दीवार की तरह इसे इंडियाटाइम्‍ज़ मूवियों में बालीवुड की शीर्ष 25 फिल्‍मों में शामिल किया। उसी साल 50 वें वार्षिक फिल्म फेयर पुरस्कार के निर्णायकों ने एक विशेष पुरस्कार दिया जिसका नाम 50 सालों की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म फिल्मफेयर पुरूस्कार था। बॉक्स ऑफिस पर शोले जैसी फिल्मों की जबरदस्त सफलता के बाद बच्चन ने अब तक अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया था और 1976 से 1984 तक उन्हें अनेक सर्वश्रेष्ठ कलाकार वाले फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और अन्य पुरस्कार एवं ख्याति मिली। उनका सुनहरा दौर आगे बढा और उन्होंने कभी कभी और अमर अकबर एंथनी जैसे सफल फिल्में दी| अमर अकबर एंथनी के लिय उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला| 1978 में उन्होंने उस साल की 4 सबसे बड़ी फिल्मों में काम किया - कसमे वादे, डॉन, त्रिशूल और मुक़द्दर का सिकंदर | डॉन में उन्होंने एक कुख्यात सरगना का किरदार निभाया और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला| फिल्म त्रिशूल और मुक़द्दर का सिकंदर से उन्होंने माँ-बेटे के प्रेम पर बनने वाली थीम को आगे बढाया जो दर्शकों को बेहद पसंद आई और इन फिल्मों के संवादों ने इतिहास में अपनी जगह बना ली| उनकी अगली फिल्में, नटवरलाल, काला पत्थर, दोस्ताना, सिलसिला उनकी सफल फिल्मों की सूची को बड़ा करती गयी| 1982 - कुली चोट 1982 में कुली फिल्म में बच्चन ने अपने सह कलाकार पुनीत इस्सर के साथ एक लड़ाई की शूटिंग के दौरान अपनी आंतों को लगभग घायल कर लिया था। बच्चन ने इस फिल्म में स्टंट अपनी मर्जी से करने की छूट ले ली थी जिसके एक सीन में इन्हें मेज पर गिरना था और उसके बाद जमीन पर गिरना था। हालांकि जैसे ही ये मेज की ओर कूदे तब मेज का कोना इनके पेट से टकराया जिससे इनके आंतों को चोट पहुंची और इनके शरीर से काफी खून बह निकला था। इन्हें जहाज से फोरन स्पलेनक्टोमी के उपचार हेतु अस्पताल ले जाया गया और वहां ये कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे और कई बार मौत के मुंह में जाते जाते बचे। यह अफ़वाह भी फैल गई थी, कि वे एक दुर्घटना में मर गए हैं और संपूर्ण देश में इनके चाहने वालों की भारी भीड इनकी रक्षा के लिए दुआएं करने में जुट गयी थी| इस दुर्घटना की खबर दूर दूर तक फैल गई और यूके के अखबारों की सुर्खियों में छपने लगी जिसके बारे में कभी किसने सुना भी नहीं होगा। बहुत से भारतीयों ने मंदिरों में पूजा अर्चनाएं की और इन्हें बचाने के लिए अपने अंग अर्पण किए और बाद में जहां इनका उपचार किया जा रहा था उस अस्पताल के बाहर इनके चाहने वालों की मीलों लंबी कतारें दिखाई देती थी. इन्होने ठीक होने में कई महीने ले लिए और उस साल के अंत में एक लंबे अरसे के बाद पुन: काम करना आरंभ किया। यह फिल्म 1983 में रिलीज हुई और आंशिक तौर पर बच्चन की दुर्घटना के असीम प्रचार के कारण बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। निर्देशक मनमोहन देसाई ने कुली फिल्म में बच्चन की दुर्घटना के बाद फ़िल्म के कहानी का अंत बदल दिया था। इस फिल्म में बच्चन के चरित्र को वास्तव में मृत्यु प्राप्त होनी थी लेकिन बाद में कहानी में परिवर्तन करने के बाद उसे अंत में जीवित दिखाया गया। देसाई ने इनके बारे में कहा था कि ऐसे आदमी के लिए यह कहना बिल्‍कुल अनुपयुक्त होगा कि जो असली जीवन में मौत से लड़कर जीता हो उसे परदे पर मौत अपना ग्रास बना ले। इस रिलीज फिल्म में पहले सीन के अंत को जटिल मोड़ पर रोक दिया गया था और उसके नीचे एक केप्‍शन प्रकट होने लगा जिसमें अभिनेता के घायल होने की बात लिखी गई थी और इसमें दुर्घटना के प्रचार को सुनिश्चित किया गया था। बाद में ये मियासथीनिया ग्रेविस में उलझ गए जो या कुली में दुर्घटना के चलते या तो भारीमात्रा में दवाई लेने से हुआ या इन्हें जो बाहर से अतिरिक्त रक्त दिया गया था इसके कारण हुआ। उनकी बीमारी ने उन्हें मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से कमजोर महसूस करने पर मजबूर कर दिया और उन्होंने फिल्मों में काम करने से सदा के लिए छुट्टी लेने और राजनीति में शामिल होने का निर्णय किया। यही वह समय था जब उनके मन में फिल्म कैरियर के संबंध में निराशावादी विचारधारा का जन्म हुआ और प्रत्येक शुक्रवार को रिलीज होने वाली नई फिल्म के प्रत्युत्तर के बारे में चिंतित रहते थे। प्रत्येक रिलीज से पहले वह नकारात्मक रवैये में जवाब देते थे कि यह फिल्म तो फ्लाप होगी। राजनीति 1984 में अमिताभ ने अभिनय से कुछ समय के लिए विश्राम ले लिया और अपने पुराने मित्र राजीव गांधी के सहयोग में राजनीति में कूद पड़े। उन्होंने इलाहाबाद लोक सभा सीट से उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एच.एन. बहुगुणा को इन्होंने आम चुनाव के इतिहास में (68.2 %) के मार्जिन से विजय दर्ज करते हुए चुनाव में हराया था। हालांकि इनका राजनैतिक कैरियर कुछ अवधि के लिए ही था, जिसके तीन साल बाद इन्होंने अपनी राजनैतिक अवधि को पूरा किए बिना त्याग दिया। इस त्यागपत्र के पीछे इनके भाई का बोफोर्स विवाद में अखबार में नाम आना था, जिसके लिए इन्हें अदालत में जाना पड़ा। इस मामले में बच्चन को दोषी नहीं पाया गया। उनके पुराने मित्र अमरसिंह ने इनकी कंपनी एबीसीएल के दिवालिया हो जाने के कारण आर्थिक संकट के समय इनकी मदद कीं। इसके बाद बच्चन ने अमरसिंह की राजनैतिक पाटी समाजवादी पार्टी को सहयोग देना शुरू कर दिया। जया बच्चन समाजवादी पार्टी से जुडी और राज्यसभा की सदस्या बन गई। बच्चन ने समाजवादी पार्टी के लिए अपना समर्थन देना जारी रखा जिसमें राजनैतिक अभियान अर्थात प्रचार प्रसार करना शामिल था। इनकी इन गतिविधियों ने एक बार फिर मुसीबत में डाल दिया और इन्हें झूठे दावों के सिलसिलों में कि वे एक किसान हैं के संबंध में कानूनी कागजात जमा करने के लिए अदालत जाना पड़ा I बहुत कम लोग ऐसे हैं जो ये जानते हैं कि स्‍वयंभू प्रैस ने अमिताभ बच्‍चन पर प्रतिबंध लगा दिया था। स्‍टारडस्‍ट और कुछ अन्य पत्रिकाओं ने मिलकर एक संघ बनाया, जिसमें अमिताभ के शीर्ष पर रहते समय 15 वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया। इन्होंने अपने प्रकाशनों में अमिताभ के बारे में कुछ भी न छापने का निर्णय लिया। 1989 के अंत तक बच्चन ने उनके सैटों पर प्रेस के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा था। लेकिन, वे किसी विशेष पत्रिका के खिलाफ़ नहीं थे। ऐसा कहा गया है कि बच्चन ने कुछ पत्रिकाओं को प्रतिबंधित कर रखा था क्योंकि उनके बारे में इनमें जो कुछ प्रकाशित होता रहता था उसे वे पसंद नहीं करते थे और इसी के चलते एक बार उन्हें इसका अनुपालन करने के लिए अपने विशेषाधिकार का भी प्रयोग करना पड़ा। सेवानिवृत्ति 1988 में बच्चन फिल्मों में तीन साल की छोटी सी राजनैतिक अवधि के बाद वापस लौट आए और शहंशाह में शीर्षक भूमिका की जो बच्चन की वापसी के चलते बॉक्स आफिस पर सफल रही। इस वापसी वाली फिल्म के बाद इनकी स्टार पावर क्षीण होती चली गई क्योंकि इनकी आने वाली सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल होती रहीं। 1991 की सफल फिल्म हम से ऐसा लगा कि यह वर्तमान प्रवृति को बदल देगी किंतु इनकी बॉक्स आफिस पर लगातार असफलता के चलते सफलता का यह क्रम कुछ पल का ही था। उल्लेखनीय है कि सफलता की कमी के बावजूद यह वह समय था जब अमिताभ बच्चन ने 1991 की फिल्‍म अग्निपथ में माफिया सरगना की यादगार भूमिका के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, जीते। ऐसा लगता था कि अब ये वर्ष इनके अंतिम वर्ष होंगे क्योंकि अब इन्हें केवल कुछ समय के लिए ही परदे पर देखा जा सकेगा| 1992 में खुदागवाह के रिलीज होने के बाद बच्चन ने अगले पांच वर्षों के लिए फिल्मों से तौबा कर ली| निर्माता अमिताभ और अभिनय में वापसी अस्थायी सेवानिवृत्ति की अवधि के दौरान बच्चन निर्माता बने और अमिताभ बच्चन कारपोरेशन लिमिटेड की स्थापना की। अमिताभ ने 1996 में वर्ष 2000 तक 10 बिलियन रूपए (लगभग २५० मिलियन अमरीकी डॉलर) वाली मनोरंजन की एक प्रमुख कंपनी बनने का सपना देखा। एबीसीएल की रणनीति में भारत के मनोरंजन उद्योग के सभी वर्गों के लिए उत्पाद एवं सेवाएं प्रचलित करना था। इसके ऑपरेशन में मुख्य धारा की व्यावसायिक फ़िल्म उत्पादन और वितरण, ऑडियो और वीडियो कैसेट डिस्क , उत्पादन और विपणन के टेलीविजन सॉफ्टवेयर , हस्ती और इवेन्ट प्रबंधन शामिल था। 1996 में कंपनी के आरंभ होने के तुरंत बाद कंपनी द्वारा उत्पादित पहली फिल्म तेरे मेरे सपने थी जो बॉक्स ऑफिस पर विफल रही | एबीसीएल ने कुछ फिल्में बनाई लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म कमाल नहीं दिखा सकी। 1997 में, एबीसीएल द्वारा निर्मित मृत्युदाता, फिल्म से बच्चन ने अपने अभिनय में वापसी का प्रयास किया। यद्यपि मृत्युदाता ने बच्चन की पूर्व एक्शन हीरो वाली छवि को वापस लाने की कोशिश की लेकिन फिल्म औंधे मूह गिरी और एबीसीएल को भरी नुक्सान हुआ | एबीसीएल 1997 में बंगलौर में आयोजित 1996 की मिस वर्ल्ड सौंदर्य प्रतियोगिता का प्रमुख प्रायोजक था और इसके खराब प्रबंधन के कारण इसे करोड़ों रूपए का नुकसान उठाना पड़ा था। इस घटनाक्रम और एबीसीएल के चारों ओर कानूनी लड़ाइयों और इस कार्यक्रम के विभिन्न गठबंधनों के परिणामस्वरूप यह तथ्य प्रकट हुआ कि एबीसीएल ने अपने अधिकांश उच्च स्तरीय प्रबंधकों को जरूरत से ज्यादा भुगतान किया है जिसके कारण वर्ष 1997 में वह वित्तीय और क्रियाशील दोनों तरीके से ध्वस्त हो गई| कंपनी प्रशासन के हाथों में चली गई और बाद में इसे भारतीय उद्योग मंडल द्वारा असफल करार दे दिया गया। अप्रेल 1999 में मुबंई उच्च न्यायालय ने बच्चन को अपने मुंबई वाले बंग्ला प्रतीक्षा और दो फ्लेटों को बेचने पर तब तक रोक लगा दी जब तक कैनरा बैंक की राशि के लौटाए जाने वाले मुकदमे का फैसला न हो जाए। बच्चन ने हालांकि दलील दी कि उन्होंने अपना बंग्ला सहारा इंडिया फाइनेंस के पास अपनी कंपनी के लिए कोष बढाने के लिए गिरवी रख दिया है। बाद में बच्चन ने अपने अभिनय के कैरियर को संवारने का प्रयास किया जिसमें उसे बड़े मियाँ छोटे मियाँ से औसत सफलता मिली और सूर्यावंशम, से सकारात्मक समीक्षा प्राप्त हुई लेकिन ये मान लिया गया कि बच्चन की महिमा के दिन अब समाप्त हुए चूंकि उनके बाकी सभी फिल्में जैसे लाल बादशाह और हिंदुस्तान की कसम बॉक्स ऑफिस पर विफल रही हैं। दूरदर्शन वर्ष 2000 में , बच्चन ने अंग्रेजी धारावाहिक, कौन बनेगा करोड़पति ? को भारत में अनुकूलन हेतु कदम बढाया। शीर्ष‍क कौन बनेगा करोड़पति जैसा कि इसने अधिकांशत: अन्य देशों में अपना कार्य किया था जहां इसे अपनाया गया था वहां इस कार्यक्रम को तत्काल और गहरी सफलता मिली जिसमें बच्चन के करिश्मे भी छोटे रूप में योगदान देते थे। यह माना जाता है कि बच्चन ने इस कार्यक्रम के संचालन के लिए साप्ताहिक प्रकरण के लिए अत्यधिक 25 लाख रुपए लिए थे, जिसके कारण बच्चन और उनके परिवार को नैतिक और आर्थिक दोनों रूप से बल मिला। इससे पहले एबीसीएल के बुरी तरह असफल हो जाने से अमिताभ को गहरे झटके लगे थे। नवंबर 2000 में केनरा बैंक ने भी इनके खिलाफ अपने मुकदमे को वापस ले लिया। बच्चन ने केबीसी का आयोजन नवंबर 2005 तक किया और इसकी सफलता ने फिल्म की लोकप्रियता के प्रति इनके द्वार फिर से खोल दिए। शहेंशाह की वापसी अमिताभ ने यश चोपरा की फिल्म मोहब्बतें के साथ धमाकेदार वापसी की| इस फिल्म में वे बॉलीवुड के बादशाह शाह रुख खान के साथ नजर आये| फिल्म दर्शकों को बेहद पसंद आई और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का पुरस्कार मिला| मोहब्बतें की सफलता को देखते हुए अमिताभ अपने उम्र के किरदार निभाने लगे जिससे वे फिर से दर्शकों के चहेते बनने लगे| इन्ही किरदारों में उनकी फिल्में कभी खुशी कभी गम और बागबान दर्शकों को बेहद पसंद आई| संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक में उन्हें एक अलग ही तरह का किरदार करने का मौका मिला जो उन्होंने आज तक पहले नहीं किया था| फिल्म कहानी थी एक बूढ़े अध्यापक और उसके अंधी-बहरी शिष्या रानी मुख़र्जी की| इस फिल्म के लिय उन्हें न सिर्फ फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया| अपनी फिल्मों की सफलता को देखते हुए, अमिताभ ने ढेरो विज्ञापनों में आना शुरू किया| 2006 में वे बेटे अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के साथ गाना कजरा रे(फिल्म: बंटी और बबली) में दिखाई दिए जो बेहद लोकप्रिय हुआ| बच्चन की सफल फिल्मों का दौर जारी रहा और उन्होंने सरकार, कभी अलविदा ना कहना और सरकार राज\ जैसी सफल फिल्में दी| 2009 में उन्होंने एक और चुनातिपूर्ण किरदार निभाया फिल्म पा में| इस फिल्म में उन्होंने प्रोजेरिया से पीड़ित 13 साल के बच्चे का किरदार निभाया| फिल्म में वे अभिषेक बच्चन के बेटे बने और उन्हें फिम्फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया| निजी जिंदगी अमिताभ बच्चन प्रसिद्ध कवी हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन के बेटे है| उनका एक भाई अजिताभ बच्चन है| उनका जन्म इलाहाबाद,उत्तर प्रदेश में हुआ| उन्होंने शेरवूड कॉलेज, नैनीताल और किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविध्यालय से पढाई पूरी की और कलकत्ता की शो एंड वाल्लेस में काम किया| आगे चलकर वे बम्बई आ गए फिल्मों में किस्मत आजमाने पर अपनी भारी आवाज़ के चलते निर्देशकों ने उन्हें अपनी फिल्मों में लेने से इनकार कर दिया| हालांकि उनकी भारी आवाज़ को पृष्ठभूमि में इस्तेमाल किया गया और उन्होंने रेडियो में भी काम किया| दिलचस्प बातें भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतरीन कलाकार| अमिताभ और राजीव गाँधी गहरे दोस्त थे और इंदिरा गाँधी की मदद से उन्हें उनकी पहली फिल्म मिली| राजीव गाँधी के कहने पर अमिताभ राजनीति में कूदे और इलाहाबाद से सांसद बने| फिल्म कुली में काम करते वक़्त उन्हें आँतों में गहरी चोट लगी और वे मौत के मूंह में जाते जाते बाल बाल बचे| उन्हें लिय हजारो करोडो दर्शकों ने मन्नतें मांगी| रेखा और अमिताभ की जोड़ी दर्शकों को बेहद पसंद आई| उन्होंने कई सारी फिल्मों में गानें भी गाए है| उनका फिल्मों में मनपसंद नाम विजय रहा और 20 से ज्यादा फिल्मों में ये नाम इस्तेमाल किया| अभिनेत्री निरूपा रॉय ने अधिकतम फिल्मों में उनकी माँ का किरदार निभाया| 58 साल की उम्र में उन्होंने 30 फीट की ईमारत से छलांग लगायी| 1996 में उन्होंने संगीत एल्बम एबी बेबी रिलीज़ किया| 1984 में उन्हें पदमा श्री से नवाजा गया| वे ही एक अभिनेता है जिन्होंने लगातार 15 साल तक हर साल कम से कम एक सफल फिल्म दी| पुरस्कार 1969 राष्ट्रीय पुरस्कार: सात हिन्दुस्तानी 1971 फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सह-कलाकार पुरस्कार: आनंद 1973 फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सह-कलाकार पुरस्कार: नमक हराम 1975 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Saturday, August 27, 2011

તમારી સફળતા પાછળ ઇશ્વરની કુપા ચોક્કસ હોય છે
અને નિષ્ફળતા પાછળ ઇશ્વરનો એક બીજો ઉદેશ હોય છે....
તમારી સફળતા પાછળ ઇશ્વરની કુપા ચોક્કસ હોય છે
અને નિષ્ફળતા પાછળ ઇશ્વરનો એક બીજો ઉદેશ હોય છે....

Gujarat Samachar : World's Leading Gujarati Newspaper

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Friday, August 26, 2011


એ જી વ્હાલા પોપટ રે બોલે જો ને પિંજરે ..
જુગતી હરિની ન જાણી ..
અકળ કળા..અવી..નાશિની ..
સુમરો સારંગ પાણી ..
એ જી વ્હાલા પોપટ રે
બોલે એ જો ને પિંજરે …

Monday, August 8, 2011

April 29, 2011 Slideshow

April 29, 2011 Slideshow: "TripAdvisor™ TripWow ★ April 29, 2011 Slideshow ★ to Umta (near Mahesana). Stunning free travel slideshows on TripAdvisor"

Sunday, August 7, 2011


જીવન રણ છે ને મિત્રતા રણદ્વિપ છે. જીવન રણની જેમ સતત વિસ્તરતું રહે છે જ્યારે આવા બળબળતા રણમાં મિત્રતા રણદ્વિપની ભિની-ભિની જીજીવિષા સમાન છે. મિત્રતા એ સંબંધ નથી પણ માનવીનો સ્વભાવ છે, મિત્રતા શરતોથી પર છે, જે શરતો પર આધિન છે તે મિત્રતા નથી. સાચી મિત્રતા પ્રેમ, પારદર્શકતા, પવિત્રતા, પ્રવાહિતા ને પ્રાર્થનાનાં પંચમહાભૂતમાંથી બનેલી છે. જેમ સિંહણનું દૂધ સોનાનાં પાત્રમાં જ ઝિલાય તેમ પારદર્શક, સ્ફટિક જેવું નિર્મળ વ્યક્તિત્વ જ ચોવીસ કેરેટ શુદ્ધ કંચન સમી મૈત્રી પામી શકે. સાચા મિત્રની સમક્ષ આપણે સંવેદનાઓને લાગણીની આંટીઘુંટીઓનું Catharsis (રેચન) કરીને હળવાં થઇ શકીએ છીએ, નકલી નિખાલસતા ને અસલી Diplomasy ની આ દૂનિયામાં મિત્રતા ને મુત્સદીગીરી વચ્ચે ખૂબજ પાતળી ભેદરેખા હોય છે.


જીવન રણ છે ને મિત્રતા રણદ્વિપ છે. જીવન રણની જેમ સતત વિસ્તરતું રહે છે જ્યારે આવા બળબળતા રણમાં મિત્રતા રણદ્વિપની ભિની-ભિની જીજીવિષા સમાન છે. મિત્રતા એ સંબંધ નથી પણ માનવીનો સ્વભાવ છે, મિત્રતા શરતોથી પર છે, જે શરતો પર આધિન છે તે મિત્રતા નથી. સાચી મિત્રતા પ્રેમ, પારદર્શકતા, પવિત્રતા, પ્રવાહિતા ને પ્રાર્થનાનાં પંચમહાભૂતમાંથી બનેલી છે. જેમ સિંહણનું દૂધ સોનાનાં પાત્રમાં જ ઝિલાય તેમ પારદર્શક, સ્ફટિક જેવું નિર્મળ વ્યક્તિત્વ જ ચોવીસ કેરેટ શુદ્ધ કંચન સમી મૈત્રી પામી શકે. સાચા મિત્રની સમક્ષ આપણે સંવેદનાઓને લાગણીની આંટીઘુંટીઓનું Catharsis (રેચન) કરીને હળવાં થઇ શકીએ છીએ, નકલી નિખાલસતા ને અસલી Diplomasy ની આ દૂનિયામાં મિત્રતા ને મુત્સદીગીરી વચ્ચે ખૂબજ પાતળી ભેદરેખા હોય છે.

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Wednesday, July 13, 2011

Journey Begins...1963

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Shankersingh was more attracted to NCC Rifles and completed ‘C’ certificate course to serve as under officer initially and warrant officer subsequently. In 1963 he enrolled for the graduation course in commerce in H. A. College in Ahmedabad, However, he gave it up in preference to a post-graduation course in economics by attending evening classes in a collage in Patan. Continuing higher studies in Ahmedabad was out of his reach. He was desperately looking for an alternative. In Patan found one. A Warrant Officer’s posting in NCC and a permission to attend evening post-graduate course.

Last Updated on Wednesday, 20 April 2011 14:43

Tuesday, March 8, 2011


વૈષ્ણવ જન તો તેને રે કહીએ, જે પીડ પરાઈ જાણે રે; પરદુ:ખે ઉપકાર કરે તોયે, મન-અભિમાન ન આણે રે... વૈષ્ણવ જન સકળ લોકમાં સહુને વન્દે, નિંદા ન કરે કેનિ રે; વાચ કાછ મન નિશ્ચલ રાખે, ધન ધન જનનિ તેની રે... વૈષ્ણવ જન સમદૃષ્ટિને તૃષ્ણા ત્યાગી, પરસ્ત્રી જેને માત રે. જિહ્વા થકી અસત્ય ન બોલે, પરધન નવ ઝાલે હાથ રે... વૈષ્ણવ જન મોહ માયા વ્યાપે નહિ જેને, દ્રઢ વૈરાગ્ય જેના મનમાં રે. રામ નામ શું તાળી રે વાગી, સકળ તિરથ તેના તનમાં રે... વૈષ્ણવ જન વણલોભી ને કપટરહિત છે, કામ ક્રોધ નિવાર્યા રે. ભણે નરસૈયો તેનું દર્શન કરતા, કુળ ઈકોતેર તાર્યા રે... વૈષ્ણવ જન

Harshad Brahmbhatt (34)

Harshad Brahmbhatt (34)

Thursday, February 17, 2011

Harshad Brahmbhatt (2)

Harshad Brahmbhatt (2)
દરિયો ભલે ને માને કે પાણી અપાર છે,
એને ખબર નથી કે નદીનું ઉધાર છે

Sunday, February 6, 2011

મર્મવેધ: ગાંધીની ગુલાંટ -વિશ્વના અમર હાસ્ય પ્રસંગોમાંથી સાભ...

મર્મવેધ: ગાંધીની ગુલાંટ -વિશ્વના અમર હાસ્ય પ્રસંગોમાંથી સાભ...: "કોંગ્રેસ અધિવેશનમાં ભાગ લેવા મુંબઈ ગયેલા ગાંધીજી એક સાંજે જૂહુના દરિયાકિનારે લટાર મારવા ગયા. ત્યાં 'બાલ્કનજી બારી' નામક સંસ્થાન..."

Gmail - [ કાવ્યાલય] આત્મહત્યા કરવા જઇ રહેલ વ્યક્તિને !!!......- કૃષ્ણ... - harshad.brahmbhatt@gmail.com



12:36am Feb 7
આત્મહત્યા કરવા જઇ રહેલ વ્યક્તિને !!!......-
ક્યાં જઇ રહ્યા છો? આત્મહત્યા કરવા?
ના રે ના, તમે તો જઇ રહ્યા છો તમારા પર મુકેલા ભરોસાની હત્યા કરવા.

તમે જેને અંત માનો છો ને? એ તો આરંભ છે તમારા પરિવાર માટે રીબાઇ રીબાઇને મરવાનો.

પથ્થરોના ટુકડાઓમાંથી ચમક ઓછી થઇ ગઇ તો શું થયું?
તમારા બાળકની આંખમામ તો એવી ને એવી જ ચમક છે
- તમે ઘસી ઘસીને હીરા ચમકાવતા હતા ને? એવી જ.

રૂપિયાની ખનક સંભળાતી બંધ થઇ તો શું થયું?
તમારી દીકરીનો ટહૂકો હજી એવો ને એવો જ મીઠ્ઠો છે
- તમે જન્મદિવસ પર અપાવેલી ઝાંઝરીના રણકાર જેવો જ.

કાગળોમાં રોકેલો વિષ્વાસ પીળો પડી ગયો તો શું થયું?
તમારી પત્નીની આંખોમાં છલકાતો વિષ્વાસ હજુયે અકબંધ છે.
- વીંટીંમાં જડેલા સાચ્ચા મોતીની સફેદી જેવો જ.

કાલથી કામ પર નહીં આવતા, એવું ખેતરે કોઇને ય કહ્યાનું
તમને યાદ છે?
સાંજે થાકીને પાછા ફરેલા પંખીને ઝાડવાએ બેસવાની ના પાડી હોય,
એવું તમને યાદ છે?
તમારી દસ પેઢીમાંય કોઇએ આત્મહત્યા કરી હોય,
એવુ તમને યાદ છે?

ગાઢ અંધારૂ છે એ ય સાચું -
ઝાંખો પ્રકાશ છે એ ય સાચું.
પણ એથી કાંઇ આમ દાઝ કરીને ટમટમતા દીવાને થોડો ઓલવી નાખવાનો હોય?

આવે ટાણે જ તો સંકોરવાની હોય સમજણની શગને,
અને પુરવાનું હોય થોડીક ધીરજનું તેલ.
બાકી સવાર તો આવી જ સમજો.........

Gmail - [ કાવ્યાલય] આત્મહત્યા કરવા જઇ રહેલ વ્યક્તિને !!!......- કૃષ્ણ... - harshad.brahmbhatt@gmail.com



12:36am Feb 7
આત્મહત્યા કરવા જઇ રહેલ વ્યક્તિને !!!......-
ક્યાં જઇ રહ્યા છો? આત્મહત્યા કરવા?
ના રે ના, તમે તો જઇ રહ્યા છો તમારા પર મુકેલા ભરોસાની હત્યા કરવા.

તમે જેને અંત માનો છો ને? એ તો આરંભ છે તમારા પરિવાર માટે રીબાઇ રીબાઇને મરવાનો.

પથ્થરોના ટુકડાઓમાંથી ચમક ઓછી થઇ ગઇ તો શું થયું?
તમારા બાળકની આંખમામ તો એવી ને એવી જ ચમક છે
- તમે ઘસી ઘસીને હીરા ચમકાવતા હતા ને? એવી જ.

રૂપિયાની ખનક સંભળાતી બંધ થઇ તો શું થયું?
તમારી દીકરીનો ટહૂકો હજી એવો ને એવો જ મીઠ્ઠો છે
- તમે જન્મદિવસ પર અપાવેલી ઝાંઝરીના રણકાર જેવો જ.

કાગળોમાં રોકેલો વિષ્વાસ પીળો પડી ગયો તો શું થયું?
તમારી પત્નીની આંખોમાં છલકાતો વિષ્વાસ હજુયે અકબંધ છે.
- વીંટીંમાં જડેલા સાચ્ચા મોતીની સફેદી જેવો જ.

કાલથી કામ પર નહીં આવતા, એવું ખેતરે કોઇને ય કહ્યાનું
તમને યાદ છે?
સાંજે થાકીને પાછા ફરેલા પંખીને ઝાડવાએ બેસવાની ના પાડી હોય,
એવું તમને યાદ છે?
તમારી દસ પેઢીમાંય કોઇએ આત્મહત્યા કરી હોય,
એવુ તમને યાદ છે?

ગાઢ અંધારૂ છે એ ય સાચું -
ઝાંખો પ્રકાશ છે એ ય સાચું.
પણ એથી કાંઇ આમ દાઝ કરીને ટમટમતા દીવાને થોડો ઓલવી નાખવાનો હોય?

આવે ટાણે જ તો સંકોરવાની હોય સમજણની શગને,
અને પુરવાનું હોય થોડીક ધીરજનું તેલ.
બાકી સવાર તો આવી જ સમજો.........
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માનનીય વડાપ્રધાન સાહેબ,

તમને પત્ર લખવાનું કારણ એટલું જ કે હવે ગળા સુધી આવી ગયું છે.

જનતાએ તમને જ્યારે ચુંટીને વડાપ્રધાનના પદે બેસાડ્યા ત્યારે જનતાની પણ તમારાથી થોડી ઘણી અપેક્ષાઓ હતી પણ જનતા બીચારી તો બીચારિ જ રહી ગઈ.

ગાંધીએ સામી છાતીએ ગોળી ખાધી ત્યારે શું એમના સ્વપ્નાનું ભારત આવું કલ્પ્યું હશે? શું ભગતસિંહ આવા ભારત માટે ફના થયા હસે ? જરાક એ બધા ક્રાંતિકારીઓની કુરબાનીઓનો તો ખ્યાલ કરો માનનીય વડાપ્રધાન સાહેબ.

તમારી સરકારમાંથી કહેવામાં આવે કે " અમારી પાસે જાદુઈ દીવો છે કે તરત મોંઘવારી ને કાબુમાં લાવીએ.?" તો મને કહો કે પેલા પવાર પાસે શું જાદુ છે કે એની મરજી મુજબ ભાવમાં વધારા ઘટાડા કર્યા કરે છે?"

તમારા એક યુવામંત્રીતો છાસવારે ગરીબોના ઘરે રાતવાસો કરી આવે છે તો પણ તમને લોકોને ગરીબોની સમસ્યા તો સમજાતી નથી. તમારા રાજમાં ગરીબ માણસ બે ટંક રોટલા ભેગો થતો હશે કે કેમ એ સવાલ છે?

સાહેબ તમને વોટ આપતી વખતે લોકોએ ઘણાં સપના જોયા છે, એમની લાગણીની કદર કરજો.

તમારા રાજમાં મોંઘવારી, ભ્રષ્ટાચાર ને કૌંભાંડોએ માઝા મુકી છે. તમને એક વિનંતી કરું છું ને કહુ છુ કે એક વાર તમને મળતી બધી જ સરકારી સવલતોનો અસ્વિકાર કરીને એક સામાન્ય માણસની જેમ ફક્ત એક મહીનો રહીને જોવો તો ખબર પડશે કે કેટલા વીસું સો થાય છે?

હું તો એક સામાન્ય માણસ છુ કે જેની આવક કરતા જાવક વધારે છે ને દર મહીને ખાડા કરવા પડે છે એટલે વધારે તો ખબર ના પડે પણ તમે ધારો તો ઘણું કરી શકો એમ છો.

માફ કરજો બીજી એક વાત કહેવાનું પણ મન થઈ જાય છે કે નામમાં સિંહ આવે છે તો જરાક સિંહ જેવું વર્તન પણ કરજો.

સાહેબ આ જનતા છે ને ચાલે છે ને ત્યાં સુધી ચલાવે છે પણ ધ્યાન રાખજો કે જે દીવસે બગડી ને તે દીવસે કપડાં પહેરવા જેવા પણ નહી રાખે માટે જનતાની લાગણીઓ સાથે રમવાનું બંધ કરો ને દેશ કલ્યાણ માટે પણ થોડું કરો તો સારું.

બીજો તમને એક સવાલ " સૌથી વધારે પૈસા દેશની સુરક્ષા પાછળ વપરાય છે તો પેલા ત્રાસવાદી તાજ સુધી કેવી રીતે પહોંચ્યા ?"

સાહેબ બીજું કે પેલો કસાબ છે ને એને આટલી વીવીઆઈપી સગવડ નહી આપોને તો ચાલશે પણ મોંઘવારી કંઇક કરો તો સારી વાત છે. કારણકે ત્રાસવાદીઓમાં તો એવી લોકવાયકા પ્રસરી ગઈ છે કે ભારતમાં તો બહુજ સારુ આપણું મિશન પુરું થાય તો આકા રાજી ને જો પકડાયા તો હવાલાતમાં ફાઈવ સ્ટાર મૌજ કરો, દરરોજ મનભાવતા ભોજન મળે છે.

સાહેબ હવે પત્ર પુરો કરું છું થોડી હૈયાવરાળ હતી તે કાઢી નાખી. ને ખોટું લાગ્યું હોય તો વધારે ખાજો , તમારે તો સરકારી પૈસે જ ખાવું છે ને?..

એક મોંઘવારી થી પીડાતો

સામાન્ય માણસ

યોગેશ જીવરાણી...


માનનીય વડાપ્રધાન સાહેબ,

તમને પત્ર લખવાનું કારણ એટલું જ કે હવે ગળા સુધી આવી ગયું છે.

જનતાએ તમને જ્યારે ચુંટીને વડાપ્રધાનના પદે બેસાડ્યા ત્યારે જનતાની પણ તમારાથી થોડી ઘણી અપેક્ષાઓ હતી પણ જનતા બીચારી તો બીચારિ જ રહી ગઈ.

ગાંધીએ સામી છાતીએ ગોળી ખાધી ત્યારે શું એમના સ્વપ્નાનું ભારત આવું કલ્પ્યું હશે? શું ભગતસિંહ આવા ભારત માટે ફના થયા હસે ? જરાક એ બધા ક્રાંતિકારીઓની કુરબાનીઓનો તો ખ્યાલ કરો માનનીય વડાપ્રધાન સાહેબ.

તમારી સરકારમાંથી કહેવામાં આવે કે " અમારી પાસે જાદુઈ દીવો છે કે તરત મોંઘવારી ને કાબુમાં લાવીએ.?" તો મને કહો કે પેલા પવાર પાસે શું જાદુ છે કે એની મરજી મુજબ ભાવમાં વધારા ઘટાડા કર્યા કરે છે?"

તમારા એક યુવામંત્રીતો છાસવારે ગરીબોના ઘરે રાતવાસો કરી આવે છે તો પણ તમને લોકોને ગરીબોની સમસ્યા તો સમજાતી નથી. તમારા રાજમાં ગરીબ માણસ બે ટંક રોટલા ભેગો થતો હશે કે કેમ એ સવાલ છે?

સાહેબ તમને વોટ આપતી વખતે લોકોએ ઘણાં સપના જોયા છે, એમની લાગણીની કદર કરજો.

તમારા રાજમાં મોંઘવારી, ભ્રષ્ટાચાર ને કૌંભાંડોએ માઝા મુકી છે. તમને એક વિનંતી કરું છું ને કહુ છુ કે એક વાર તમને મળતી બધી જ સરકારી સવલતોનો અસ્વિકાર કરીને એક સામાન્ય માણસની જેમ ફક્ત એક મહીનો રહીને જોવો તો ખબર પડશે કે કેટલા વીસું સો થાય છે?

હું તો એક સામાન્ય માણસ છુ કે જેની આવક કરતા જાવક વધારે છે ને દર મહીને ખાડા કરવા પડે છે એટલે વધારે તો ખબર ના પડે પણ તમે ધારો તો ઘણું કરી શકો એમ છો.

માફ કરજો બીજી એક વાત કહેવાનું પણ મન થઈ જાય છે કે નામમાં સિંહ આવે છે તો જરાક સિંહ જેવું વર્તન પણ કરજો.

સાહેબ આ જનતા છે ને ચાલે છે ને ત્યાં સુધી ચલાવે છે પણ ધ્યાન રાખજો કે જે દીવસે બગડી ને તે દીવસે કપડાં પહેરવા જેવા પણ નહી રાખે માટે જનતાની લાગણીઓ સાથે રમવાનું બંધ કરો ને દેશ કલ્યાણ માટે પણ થોડું કરો તો સારું.

બીજો તમને એક સવાલ " સૌથી વધારે પૈસા દેશની સુરક્ષા પાછળ વપરાય છે તો પેલા ત્રાસવાદી તાજ સુધી કેવી રીતે પહોંચ્યા ?"

સાહેબ બીજું કે પેલો કસાબ છે ને એને આટલી વીવીઆઈપી સગવડ નહી આપોને તો ચાલશે પણ મોંઘવારી કંઇક કરો તો સારી વાત છે. કારણકે ત્રાસવાદીઓમાં તો એવી લોકવાયકા પ્રસરી ગઈ છે કે ભારતમાં તો બહુજ સારુ આપણું મિશન પુરું થાય તો આકા રાજી ને જો પકડાયા તો હવાલાતમાં ફાઈવ સ્ટાર મૌજ કરો, દરરોજ મનભાવતા ભોજન મળે છે.

સાહેબ હવે પત્ર પુરો કરું છું થોડી હૈયાવરાળ હતી તે કાઢી નાખી. ને ખોટું લાગ્યું હોય તો વધારે ખાજો , તમારે તો સરકારી પૈસે જ ખાવું છે ને?..

એક મોંઘવારી થી પીડાતો

સામાન્ય માણસ

યોગેશ જીવરાણી...

માનનીય વડાપ્રધાન સાહેબ,

તમને પત્ર લખવાનું કારણ એટલું જ કે હવે ગળા સુધી આવી ગયું છે.

જનતાએ તમને જ્યારે ચુંટીને વડાપ્રધાનના પદે બેસાડ્યા ત્યારે જનતાની પણ તમારાથી થોડી ઘણી અપેક્ષાઓ હતી પણ જનતા બીચારી તો બીચારિ જ રહી ગઈ.

ગાંધીએ સામી છાતીએ ગોળી ખાધી ત્યારે શું એમના સ્વપ્નાનું ભારત આવું કલ્પ્યું હશે? શું ભગતસિંહ આવા ભારત માટે ફના થયા હસે ? જરાક એ બધા ક્રાંતિકારીઓની કુરબાનીઓનો તો ખ્યાલ કરો માનનીય વડાપ્રધાન સાહેબ.

તમારી સરકારમાંથી કહેવામાં આવે કે " અમારી પાસે જાદુઈ દીવો છે કે તરત મોંઘવારી ને કાબુમાં લાવીએ.?" તો મને કહો કે પેલા પવાર પાસે શું જાદુ છે કે એની મરજી મુજબ ભાવમાં વધારા ઘટાડા કર્યા કરે છે?"

તમારા એક યુવામંત્રીતો છાસવારે ગરીબોના ઘરે રાતવાસો કરી આવે છે તો પણ તમને લોકોને ગરીબોની સમસ્યા તો સમજાતી નથી. તમારા રાજમાં ગરીબ માણસ બે ટંક રોટલા ભેગો થતો હશે કે કેમ એ સવાલ છે?

સાહેબ તમને વોટ આપતી વખતે લોકોએ ઘણાં સપના જોયા છે, એમની લાગણીની કદર કરજો.

તમારા રાજમાં મોંઘવારી, ભ્રષ્ટાચાર ને કૌંભાંડોએ માઝા મુકી છે. તમને એક વિનંતી કરું છું ને કહુ છુ કે એક વાર તમને મળતી બધી જ સરકારી સવલતોનો અસ્વિકાર કરીને એક સામાન્ય માણસની જેમ ફક્ત એક મહીનો રહીને જોવો તો ખબર પડશે કે કેટલા વીસું સો થાય છે?

હું તો એક સામાન્ય માણસ છુ કે જેની આવક કરતા જાવક વધારે છે ને દર મહીને ખાડા કરવા પડે છે એટલે વધારે તો ખબર ના પડે પણ તમે ધારો તો ઘણું કરી શકો એમ છો.

માફ કરજો બીજી એક વાત કહેવાનું પણ મન થઈ જાય છે કે નામમાં સિંહ આવે છે તો જરાક સિંહ જેવું વર્તન પણ કરજો.

સાહેબ આ જનતા છે ને ચાલે છે ને ત્યાં સુધી ચલાવે છે પણ ધ્યાન રાખજો કે જે દીવસે બગડી ને તે દીવસે કપડાં પહેરવા જેવા પણ નહી રાખે માટે જનતાની લાગણીઓ સાથે રમવાનું બંધ કરો ને દેશ કલ્યાણ માટે પણ થોડું કરો તો સારું.

બીજો તમને એક સવાલ " સૌથી વધારે પૈસા દેશની સુરક્ષા પાછળ વપરાય છે તો પેલા ત્રાસવાદી તાજ સુધી કેવી રીતે પહોંચ્યા ?"

સાહેબ બીજું કે પેલો કસાબ છે ને એને આટલી વીવીઆઈપી સગવડ નહી આપોને તો ચાલશે પણ મોંઘવારી કંઇક કરો તો સારી વાત છે. કારણકે ત્રાસવાદીઓમાં તો એવી લોકવાયકા પ્રસરી ગઈ છે કે ભારતમાં તો બહુજ સારુ આપણું મિશન પુરું થાય તો આકા રાજી ને જો પકડાયા તો હવાલાતમાં ફાઈવ સ્ટાર મૌજ કરો, દરરોજ મનભાવતા ભોજન મળે છે.

સાહેબ હવે પત્ર પુરો કરું છું થોડી હૈયાવરાળ હતી તે કાઢી નાખી. ને ખોટું લાગ્યું હોય તો વધારે ખાજો , તમારે તો સરકારી પૈસે જ ખાવું છે ને?..

એક મોંઘયોગેશ જીવરાણી...

Gmail - [ કાવ્યાલય] New doc: મનમોહનસિંહ ને પત્ર. - harshad.brahmbhatt@gmail.com

Gmail - [ કાવ્યાલય] New doc: મનમોહનસિંહ ને પત્ર. - harshad.brahmbhatt@gmail.com

Saturday, February 5, 2011

orkut - my profile

orkut

न खुदा मिला न खुदाई मीली,

महोब्बतमे हमें तो तन्हाई मीली ।

अय खुदा तेरे जहांका निझाम कैसा है ?

ऊन्हे वफा मीली हमे रूसवाई मीली ।

काफी था खूं हमारा बयाने उल्फतको,

ईसलिये न कलम मीली न रोशनाई मीली ।

न तो शौहरत मीली न तो दौलत मीली,

फिर कयूं जनाजेपे आखें सब झिलमिलाई मीली ?

संजीदा था " राझ " सिर्फ अपने ही हालपे,

जो भी मिला हालत सभीकी लडखडाई मीली ।


Thursday, February 3, 2011

Drop Box - Harshad Brahmbhatt - Picasa Web Albums

Drop Box - Harshad Brahmbhatt - Picasa Web Albums

એક પળમાં પરોવી દઉં જીવતર આખુંય
બોલ, આપી શકીશ એવું કંઈ?

સાંજ મને સોનેરી જોઈતી નથી કે નથી રૂપેરી રાતનાં ય ઓરતા,
એક્કે ય વાયદા કે વેણ નથી જોઈતાં, એમાં ગુલમ્હોર છોને મ્હોરતા.

અઢળકની ઝંખનાઓ છોડીને આવી છું સાંજ તણી આશાએ અહીં,
બોલ, આપી શકીશ એવું કંઈ ?

મારામાં ઊગેલું મારાપણું ય હવે તારામાં રોપી હું છુટ્ટી,
લેવાથી દેવાનો અદકેરો લ્હાવ હવે ખોલી દે બાંધી આ મુઠ્ઠી.

ચીતરેલા ફૂલને ય ફૂટે સુગંધ એવું આંખોમાં જોતી હું રહી,
બોલ, આપી શકીશ એવું કંઈ ?

- નંદિતા ઠાકોર


My Photos - February 2, 2011 (7)

My Photos - February 2, 2011 (7)સોના વાટકડી રે કેસર ઘોળ્યાં વાલમિયા..

લીલો તે રંગનો છોડ રંગમાં રોળ્યાં વાલમિયા..

પગ પરમાણે રે કડલાં સોઈ વાલમિયા..
ઘૂઘરીની બબ્બે તરે જોડ રંગમાં રોળ્યાં વાલમિયા..
સોના વાટકડી રે…

હાથ પરમાણે રે ચૂડલા સોઈ વાલમિયા..
ચૂડલીની બબ્બે જોડ રંગમાં રોળ્યાં વાલમિયા..
સોના વાટકડી રે…

નાક પરમાણે રે નથડી સોઈ વાલમિયા..
ટીલડીની બબ્બે તારે જોડ રંગમાં રોળ્યાં વાલમિયા..
સોના વાટકડી રે

My Photos - January 29, 2011 (3)

My Photos - January 29, 2011 (3)મળ્યો છે સૌને જીવનમાં સમય થોડોક તો સારો,
ફિકર પોતાની કોઈનેય નિદ્રામાં નથી હોતી.

બીજા તો શું મને અંધકારમાં રાખીને છેતરશે ?
કે મારી જાત ખુદ મારીય છાયામાં નથી હોતી.

ગઝલમાં એ જ કારણથી હું મૌલિક હોઉં છું ‘બેફામ’
પીડા મારાં દુ:ખોની કોઈ બીજામાં નથી હોતી

Tuesday, February 1, 2011

ગુજરાત મંત્રીમંડળનું વિસ્તરણ શરુ - expandation in state ministry - www.divyabhaskar.co.in

અહીં પ્રેમ કેરો સાદ છે
પ્રભુજીનો પ્રસાદ છે
ને પ્રકૃતિનો વરસાદ છે !
Boss, આ ગુજરાત છે !

અહીં નર્મદાનાં નીર છે
માખણ અને પનીર છે
ને ઊજળું તકદીર છે !
Yes, આ ગુજરાત છે !

અહીં ગરબા-રાસ છે
વળી જ્ઞાનનો ઉજાસ છે
ને સોનેરી પરભાત છે
અલ્યા, આ ગુજરાત છે !

અહીં ભોજનમાં ખીર છે
સંસ્કારમાં ખમીર છે
ને પ્રજા શૂરવીર છે !
કેવું આ ગુજરાત છે !

અહીં વિકાસની વાત છે
સાધુઓની જમાત છે
ને સઘળી નાત-જાત છે
યાર, આ ગુજરાત છે !

અહીં પર્વોનો પ્રાસ છે
તીર્થો તણો પ્રવાસ છે
ને શૌર્યનો સહવાસ છે !
દોસ્ત, આ ગુજરાત છે !
ગુજરાત મંત્રીમંડળનું વિસ્તરણ શરુ - expandation in state ministry - www.divyabhaskar.co.in

Sunday, January 30, 2011

» કાવ્યસંગીતશ્રેણી : કવિ શ્રી મકરન્દ દવેના કાવ્યોની અમર ભટ્ટ દ્વારા પ્રસ્તુતિ : 18 December - Ahmedabad સૂર-શબ્દોત્સવ

» કાવ્યસંગીતશ્રેણી : કવિ શ્રી મકરન્દ દવેના કાવ્યોની અમર ભટ્ટ દ્વારા પ્રસ્તુતિ : 18 December - Ahmedabad સૂર-શબ્દોત્સવ

ચોર્યાંસી ભાતનો સાથિયો રે માંડ્યો
કે લાલ રંગ ખૂટ્યો સાહેલડી જી રે
અડધી ભાતે રે મારો સાહ્યબો રિસાયો
કે હાય સંગ છૂટ્યો સાહેલડી જી રે

મેઘધનુ રંગની ભાત વચ્ચોવચ્ચ
કોઈ અજબ રંગ સાંપડ્યો જી રે
જાતાં પડ્યોતો પગ વાલમના આંગણિયે
લોક કહે સાથિયો બગડ્યો જી રે

પથ પથરાઈ મારો જીવડો પુકાર્યો
કે પિયુ કેમ રૂઠ્યો સાહેલડી જી રે

ચોર્યાંસી ભાતનો…..

કોઈ જાણભેદુને પાછળ દોડાવ્યો
કે આવ્યો સંદેશ લઈ સોગિયો જી રે
પરદેશ જઈ વ્હાલે રંગ મોકલાવ્યો
તે લાલ નહિ નીકળ્યો જોગિયો જી રે

અંગે અંગે તે મારે રોમ રોમ લાગ્યો
કે આગ થઈ ફૂટીયો સાહેલડી જી રે

ચોર્યાંસી

Friday, January 28, 2011


"જે ગયું એ તો ગયું, જે છે તું એનું ધ્યાન કર.
નીકળે છે જે વચન કડવા,એ સૌ ને મ્યાન કર

આ બધું તારૂં છે એવું શાને તુજને લાગતું,
માટીનો તું માટી થાશે,માટીમાં તુજ ધામ કર"

Monday, January 24, 2011


મારું હૃદય તાર પર તણાયું છે
તંગ, તંગ.
નાની અમથી લખેરખી
ભલે મંદમંદ
મૂકી શકે કંપ.
તારો કેવળ એક શબ્દ
ગમે તેટલો હળવો,
તેને નંદવી શકે

harshadbrahmbhatt

harshadbrahmbhatt

એની યાદો બસ બાકી બચે છે,
કોઈ એવી રીતે વિસ્તરે છે.

શાંત દરિયો અને ખાલી હોડી,
બેઉ સાથે ઉદાસી ઘડે છે.

કાં તો સરનામું ખોટું કાં પોતે,
દ્વાર પરથી એ પાછો વળે છે.

લાખ હસવાની કોશિશ કરું છું,
એમને તોય ઓછી પડે છે.

છે મુમકીન મળે કોઈ પંખી,
એક પીછું હવામાં તરે

My Photos - January 18, 2011 (10)

My Photos - January 18, 2011 (10)